Monday, September 24, 2007

ये कौन हैं नक्सलवाद पर सवाल उठाने वाले।

पाश मेरे पसंदीदा कविओं में से है और पंजाब में जिस ढंग से उन्होंने अपनी पहचान बनाई है वह काबिले तारीफ है। उनकी बेहतरीन कविताओं में से एकसबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना जब मैंने अपने ब्लाग पर पब्लिश की थी तो हर तरह की प्रतिक्रियाएं िमलीं। जिसमें एक पाठक संजीव कुमार सिन्हा ने लिखा कि कृपया नक्सलवादियों को महिमामंडित मत करें. यह राष्ट्रद्रोहियों को पुरुस्कृत करने जैसा हैं.
लेकिन उनकी इस प्रतिक्रिया से बहुत से पाठकों को और दोस्तों को आपत्ति है। हालांकि सब आपत्तियां तो मैं यहां नहीं दर्ज करा पाऊंगी। पर नवीन कुमार की आपत्ति काबिले गौर है।




ये कौन हैं नक्सलवाद पर सवाल उठाने वाले। जिन्हें न जिंदगी का सलीका मालूम है न विरोध का शऊर। जिंदगी से भागे हुए लोग गरिया रहे हैं नक्सलवादियों को जिन्हें खुद ही नहीं मालूम कि जाना किधर है। अपने हक के लिए आवाज बुलंद करना अगर नक्सलवाद है तो हर आदमी वो आदमी नक्सली है जो सोचता है, और नहीं है तो वो नक्सली हो जाने की तमन्ना रखता है। दपदप करते सफेद कॉलर के नीचे एक पिलपिला सा कलेजा रखने वाले भी आजकर नक्सलवाद पर बोल लेते हैं। वो अपने दफ्तरों में भी आवाज नहीं उठा पाते लेकिन जो अपना समूचा अस्तित्व हथेली पर रखकर जमाने के खिलाफ सीना ताने खड़े हैं उनकी कविताएं भी उन्हें एक चरमपंथी परंपरा का महिमामंडन लगती हैं।

बस करो भाई। ये वो लोग हैं जो न वर्ण व्यवस्था से बाहर निकल पाए न अपने दकियानूसी सामाजिक पूर्वाग्रहों से। रोकड़े के दमपर ऊंची-ऊंची डिग्रियां हासिल करके ये काबिज़ हो जाते हैं समूची व्यवस्था पर। एक ऐसी व्यवस्था पर जिन्हें सूट नहीं करता मुनाफे की अर्थव्यवस्था पर सवाल खड़ा करना। इसीलिए वो चाहते हैं लोग अनपढ़ बने रहें, उनकी जय बोलते रहें, उनके चरणों में झुके रहें। इनकार करो तो आप नक्सली हैं। तो सुन लीजिए साहबानों इस देश की आधी से ज्यादा आबादी नक्सली हैं क्योंकि जिन लोगों की खाली मुट्ठियों में बल्लम थमाकर आप शेर बने बैठे थे उनकी आंखें आज आग बन रही हैं।

-नवीन कुमार

6 comments:

आशीष said...

देश में सबसे अधिक तादाद इन्ही लोगों की है जो केवल और केवल आन्दोलन करियों को गरियाने का काम करते हैं. इन लोगों का काम ही पानी पी कर लोगों को गली देना...नवीन जी ने सही ही कहा की ये कौन हैं नक्सलवाद पर सवाल उठाने वाले।..

आशीष said...

देश में सबसे अधिक तादाद इन्ही लोगों की है जो केवल और केवल आन्दोलन करियों को गरियाने का काम करते हैं. इन लोगों का काम ही पानी पी कर लोगों को गली देना...नवीन जी ने सही ही कहा की ये कौन हैं नक्सलवाद पर सवाल उठाने वाले।..

राजीव रंजन प्रसाद said...

नवीन कुमार जी की आपत्ति केवल पाश की कविता और उनके सम्मान पर होती तो संभव है मैं उनके साथ खडा मिलता। पाश के शब्द ठंडा रक्त भी उबाल सकते हैं।

किंतु नक्सलवाद एक दूसरा ही विन्दु है। इस पर आज सवाल न उठाने वाले सार्वजनिक अमन के शत्रु जान पडते हैं। जिन्दगी से भागे हुए लोग नहीं जिन्दगी से भागे हुए लोगों पर सवाल है। बस्तर के जंगलों में, झरखंड की गुफाओं में बंदूक थाम कर दुबके हुए लोग वैसे ही क्रांतिकारी नहीं कहे जा सकते जैसे मैं पाश को उनकी श्रेणी में नहीं रखता। समूचा अस्तित्व हथेली पर रख कर किसके खिलाफ खडे हैं - हमारे ही तो?

नक्सली अगर सही हैं तो कश्मीर के आतंकवादी क्यों नहीं? असम के विद्रोही क्यों नहीं? लिट्टे क्यों नहीं?....आपकी नजरों में ओसामा भी क्रांतिकारी ही होगा?

मैं दो लिंक आपको दे रहा हूँ उम्मीद है आप पढेंगे अवश्य।

http://merekavimitra.blogspot.com/2007/03/blog-post_6203.html

http://merekavimitra.blogspot.com/2007/06/blog-post_19.html

*** राजीव रंजन प्रसाद

हरिमोहन सिंह said...

नक्‍सलियों को कश्‍मीर के उग्रवादियों के बराबर खडा करना गलत बात

मेरा कच्चा चिट्ठा said...

यह कैसा दोहरा चरित्र है कि आप पाश के साथ तो हैं लेकिन उनके बुनियादी चरित्र के साथ नहीं। कविता अंधेरे में नहीं लिखी जाती मेरे दोस्त। वह आम आदमी से संवाद करती है। उनकी बात कहती है। नहीं तो फिर छायावाद में उलझे रहिए। वहां आपको ज्यादा आनंद आएगा।

नक्सलवाद दूसरा बिंदु नहीं है, पहला बिंदु है। खेल खाए अघाए लोग अमन की बात कर रहे हैं। बताना जरा भाई, वो कौन लोग हैं जिन्हें उनकी जमीन, जंगल और नदियों से बेदखल कर दिया गया है। जिन्हें कभी बांध और कभी शहरी विकास के नाम पर उजाड़ा जा रहा है। जिन्हें मजदूरी के बदले जिल्लत मिलती है। आप दिल्ली और बनारस में रहकर क्रांति कर रहे हैं और जो बस्तर, झाबुआ और पलामू में एक बर्बर व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे हैं वो 'दुबके' हुए हैं। लेकिन अमेरिकी जन्मघुट्टी पीकर जिन्होंने दुनियादारी के उसूल सीखे उन्हें यह सब बड़ा गड़बड़ लगेगा। ऐसे लोगों को हर मुसलमान आतंकवादी लगता है, नॉर्थ ईस्ट का हर आदमी उल्फा का सदस्य और हर तमिल लिट्टे का कार्यकर्ता। इसीलिए वो ओसामा और पाश में फर्क नहीं कर पाते। उन्हें गोरख पांडे एक सनकी आदमी लगता है। वरवर राव एक चरमपंथी और गदर आतंकवादी।

गोलियों से भून दो सबको अगर ऐसा समझते हो। लेकिन याद रखना हर गिरी हुई गर्दन हजारों नक्सली पैदा करेंगी। क्योंकि तुम्हारी रखैल व्यवस्थाएं साठ साल से इंसाफ का गला घोंट रही हैं। और अब हमें ये मंजूर नहीं है। बोलेंगे हम। तुम इसे आतंकवाद कहोगे हम जानते हैं, लेकिन इस बार हम तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाले। सच कहना, तुम्हें हमारे बोलने से इतना डर क्यों लगता है?

Sanjeeva Tiwari said...

इस अंतहीन वाकयुद्ध से भी मेरे बस्‍तर को सुख नहीं मिल सकता । पर मैं वहीं से लिख रहा हूं जहां यह समस्‍या विकराल रूप लेकर खडी है, कल तक हम सबने ये नदी अपनी, ये पहाड अपने, ये जंगल मेरा के गीत गायें हैं, ये गीत उन्‍हीं लोगों ने गाया है जिनके ये वास्‍तविक में हैं । पर मेरे भाई बस्‍तर में अब ये कमान छत्‍तीसगढिया आदिवासी नहीं बंदूक कंधे में लेकर कोई और गा रहा है, सरकार भी यही गीत गा रही है और मूल बस्‍तरिहा इन दोनों की लडाई में पिस रहा है ।

चाहे गदर हों या पाश हों इनके गीतों से खून खौलना ही चाहिए पर ये खून मेरा खौले, राजीव का खौले तो कोई बात बने, बंदूक भले हमने थाम ली है पर ट्रिगर तो आज भी नेपाल,आंध्र और बंगाल के नेताओं के हांथ में है, हमने तो पाश के गीत सुने भी नहीं हैं कोई उसे हम तक तो पहुंचाये हमें साक्षर बनाये, हम तो छले ही जा रहे हैं और आप लोग शव्‍दों का ताना बाना मजे से लूट रहे हैं