Wednesday, May 14, 2008

किसकी नज़र लगी मेरे शहर को

कल रात जैसे ही बम धमाकों की खबर आई मैंने ब्लाग पर उसी समय खबर जिस हाल में डाल दी थी फिर ब्लाग लिख नहीं पाई। अब तक जयपुर में साठ से ज्यादा जानें जा चुकी हैं और करीब 150 लोग घायल हैं। कुछ घायलों की स्थिति तो ऐसी है कि उनकी भी जान किसी भी समय जा सकतीहै। ये सभी छह बम धमाके जयपुर के भीड़ भरे इलाके परकोटे(वाल्ड सिटी) में हुए। कुछ सूत्र ये भी बताते हैं कि बम धमाके 7 से 9 तक भी हो सकते है। चांदपोल, हवामहल, त्रिपोलिया, सांगानेरी गेट जैसे भीड़ भरे इलाकों में ये सभी सिलसिलेवार बम धमाके हुए।एसएमएस अस्पताल में देर रात तक चीख पुकार मची हुई थी। लोग अपने परिजनों को ढूंढ रहे थी,खून की कमी थी। सचमुच एक अजीब सा दुख अंदर ही अंदर खाए जा रहा था कि मेरे शहर को किसकी नजर लग गई। हमेशा शांत रहने वाला मेरा शहर क्यों आज दुख से कराह रहा है। राजस्थान की सीमाएं सील कर दी गईं, आज भी शहर के कई इलाकों में कर्फ्यू है। बाजार बंद है, काम ठप पड़ा है। आखिर मेरे शहर के साथ ऐसा क्यों हो रहा है।कुछ आतंकवादी सिर्फ अपनी बात मनवाने के लिए अपनी मौदूदगी दिखाने के लिए ऐसे कैसे किसी की भी जान ले सकते है। 60 लोगों की जिंदगियां क्या उनके लिए कोई मायन नहीं रखती, बहुत से प्र्शन हैं पर जवाब कहीं नहीं।

Tuesday, May 13, 2008

जयपुर में सीरियल बम ब्लास्ट

जयपुर में सीरियल बम ब्लास्टदेश के सबसे शांत राज्यों में माने जाने वाले राजस्थान में आज जबरदस्त आतंकवादी हमले हुए। राजधानी जयपुर के परकोटे यानी पुराने सिटी में छह सीरियल बम ब्लास्ट हुए हैं जिसमें अभी तक छह लोगों के मरने की सूचना है। ये सारे ब्लास्ट भीड़ भरे इलाकों जौहरी बाजार, हवामहल, चांदपोल, माणक चौक और सांगानेरी गेट, त्रिपोलिया में एक घंटे पहले ही हुए हैं। ये भी जगह इस समय इतनी क्राउडेड होती हैं कि वहां पैर रखने की जगह नहीं होती। इनमें से दो तो हनुमानजी के मंदिर के पास हुए हैं। मंगलवार की वजह से वहां पर शाम के समय भीड़ कुछ ज्यादा ही होती है। अभी तक छह लोगों के मरने की सूचना है पर रात होते-होते यह संख्या काफी बढ़ जाएगी क्योंकि अभी घायलों और मृतों को अस्पताल पुहंचाने का काम शुरू ही हुआ है।

Saturday, May 10, 2008

उदासी

उदासी जिन्दगी का किनता महत्वपूर्ण हिस्सा है, कभी कभी तो ये जिन्दगी ही हो जाती है। कभी दोस्तों से घिरे रहने वाले हम, बात-बेबात पर कहकहे लगाने वाले कब इतने शांत हो जाते हैं कि हमें खुद भी पता नहीं चलता। इन्फेक्शियस स्माइल कब उदासी में बदल जाती है। मेरा सबसे प्यारा दोस्त उसके पापा की डैथ हो गई, हुए भी एक महीना हो गया। और मुझे पता तक नहीं । कितने मसरूफ हो गए हैं हम लोग अपनी जिन्दगी जिन्दगी में. आपका सबसे खास दोस्त जिन्दगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और आप उसे सांत्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते। महीने बाद आपको तब पता चलता है जब अपने दुख, तन्हाई और उदासी से वो लड़ भी नहीं पाता।कभी नहीं समझ पाई सृष्टि में दुख क्यों आए। शायद इसी वजह से भगवान पर कभी होल हार्टेडली यकीन भी नहीं होता। अगर सचमुच वो होता है तो दुख क्यों होता, सब लोगों के चेहरे पर श्री श्री रविशंकर जी की सी 440 वाल्ट की स्माईल क्यों नहीं होती।आज बिलकुल ऐसा नहीं है कि मैं हंस नहीं पा रही हूं वाला मामला पर उदासी कि कितने भी खिड़की दरवाजे बंद कर लो किसी झिर्री से झांक ही लेती है। खुद को कितना भी व्यस्त कर लो पर ये खुद से अलग हो ही नहीं पाती।

Tuesday, April 29, 2008

चार पंक्तियाँ


उन ख्वाबों के लिए जो कभी देखे ना जा सके


उन बातों के लिए जो कभी कही ना जा सकीं


उन लम्हों के लिए जो कभी जिए ना जा सके


जो केवल शब्द थे और शब्द कर रह गए



एक दोस्त द्वारा भेजा गया

Monday, April 28, 2008

मैं हंसना चाहती हूं

कुछ दिन ऐसे क्यों होते हैं आप चाहें ना चाहें तनाव आपका पीछा नहीं छोड़ता। आप कितना भी खुश होने की कोशिश करें मुस्कुराहट होठों तक आती ही नहीं। यूं लगता है कि होंठ जैसे जुड़ गए हों, कितनी भी कोशिश करें आप हंस नहीं सकते।एक मित्र का फोन था तनाव में क्यों हो, पता नहीं। मेरी मां भी ऐसे ही करते है बिना बात के तनाव लेती रहती है।शायद हम औरतें ऐसी ही हैं, मैं चाहूं भी तो खुद को बदल नहीं सकती। पर मैं हंसना चाह रही हूं पर और हंस नहीं पा रही हूं।कोई तारीफ कोई जोक कोई बात मुझे हंसा नहीं पा रही है। ऐसा क्यों होता है, नहीं जानती और जानना भी नहीं चाहती पर मैं हंसना चाहती हूं पर हंसी है कि आज रूठी हुई है। जैसे बचपन में मुंह फुला कर बैठने पर पापा कहते थे कि गुड़िया हम से कब तक रूठी रहोगी ना हंसोगी कब तक। और हम लोग फट से हंस पड़ते थे। अब कोई ऐसा गीत क्यों सुनाकर हंसाता नहीं है

Saturday, April 26, 2008

शादी के साइड इफेक्ट्स


हमारे एक कलिग हैं जिनकी नई-नई शादी हुई है। शादी के शुरुआती दो तीन महीने तो सब कुछ बहुत अच्छा-अच्छा चलता रहा, गुडी-गुड। लेकिन आजकल कुछ परेशान नजर आते हैं। जब हमने इन भाई से जानकारी ली तो पता चला कि पत्नी की वजह से काफी परेशान हैं। नई-नई शादी हुई है, दोनों एक दूसरे को समझ ही नहीं पाए। पत्नी ज्यादातर समय मायके या ससुराल गांव में रही, अब वो परेशान हो रहे हैं कि यहां आने का नाम नहीं लेती। आती है तो नई-नई डिमांड्स के साथ। पत्नी की उम्र काफी कम हैं, भाई को समझाया अभी छोटी है, उसमें बचपना है उसकी बात सुना और कुछ फरमाइशें पूरी करने में कोई बुराई नहीं है। वो इससे भी मना नहीं करते, लेकिन फिर भी परेशानी है कि उनका पीछा नहीं छोड़ रही। कल से तो वो मरने की बात करने लगा, उसे बिठा कर समझाया बुझाया गया पर तनाव है कि उसके दिमाग से हटने का नाम ही नहीं ले रहा। कहता है कि और किसी पे गुस्सा निकाल नहीं सकता, इसलिए रास्ते में कभी अपनी बाइक को गालियां देता हूं तो कभी खुद को। ना खाने का होश है ना सोने का।हमने कहा बीवी को मसरूफ कर दो, तुम तो सारा दिन आफिस में रहते हो, वो बेचारी बोर हो जाती होगी लेकिन वो कम्प्यूटर कोर्स या आगे की पढ़ाई करने के लिए भी हां नहीं भरती। कलिग का गांव में बड़ा संयुक्त परिवरा है, कहती है वहां रहूंगी अपने देवर और ननदों के साथ। सास नहीं है तो ससुरजी की सेवा करूंगी। लेकिन कलिग की ताई जिसने उन्हें बचपन से पाला उनके लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं। वो कहते हैं संयुक्त परिवार में रहना है तो उसके कायदे से रहो। पर वो इसके लिए भी तैयार नहीं है।खैर मैंने तो इन कलिग को अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे दी है। और शुभकामनाएं भी कि वो जल्दी से तनाव से बाहर आ जाएं और उनकी सारी चिंता दूर हो कर सब सामान्य हो जाए। अगर आप के पास कोई सलाह हो तो हमारे इन कलिग को जरूर दीजिए, शायद कोई हल निकल आए।

Friday, April 25, 2008

तन्हाई कहीं जान न ले ले

बीबीसी से साभार

अगर आप अकेले ज़िंदगी बिता रहे हैं तो यह आपके दिल के लिए एक ख़तरे की घंटी है और इससे बचना है तो तुरंत अपना कोई साथी खोज लें.
कुछ ऐसा ही सुझाव डेनमार्क में हुए एक शोध में दिया गया है कि अकेले रहने वाले लोगों को दिल की बीमारियों का ख़तरा जोड़े में रह रहे लोगों की तुलना में दोगुना ज़्यादा है.
शोध के मुताबिक अकेले रहने वाली 60 बरस से ऊपर की महिलाएँ और 50 बरस से ज़्यादा उम्र के पुरुषों को एंजाइना और दिल का दौरा पड़ने का ज़्यादा ख़तरा हो सकता है.
यह शोध एपिडेमोलॉजी एंड कम्यूनिटी हेल्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.
विशेषज्ञ बताते हैं कि अकेले रहने वालों में खान-पान का ध्यान न देना और ज़्यादा धूम्रपान करना जैसी आदतें पाई जाती हैं जो कि इस ख़तरे को बढ़ा देती हैं.
इस शोध के लिए आर्हुस सीजियस विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने आर्हुस क्षेत्र में रहने वाले 138,000 से भी ज़्यादा वयस्कों के आकड़ों का अध्ययन किया.
अध्ययन के मुताबिक वर्ष 200-02 के दौरान 646 लोगों में एंजाइना की गंभीर शिकायत या फिर दिल के दौरा पड़ने जैसी शिकायतें मिलीं. इनमें से कुछ लोगों की मौत गंभीर हृदय रोगों के कारण हुई.
उम्र और अकेलापन
पाया गया कि इन लोगों में बढ़ती उम्र और अकेलापन इन बीमारियों की अहम वजह थी.
60 वर्ष से ज़्यादा उम्र की तन्हा महिलाओं की तादाद कुल जनसंख्या का पाँच प्रतिशत ही थी पर 30 दिनों तक किए गए परीक्षण में पाया गया कि इस दौरान जिन लोगों का निधन हुआ उनमें इनकी तादाद एक तिहाई थी.
" दिल की बीमारियों का ख़तरा उन लोगों में ज़्यादा है जो कि अकेले रहते हैं। हालांकि कुछ और भी वजहें हो सकती हैं जिनकी हम अभी तक पड़ताल नहीं कर पाए हैं "
डॉक्टर क्रिस्टीन नेल्सन, शोधकर्ताओँ के प्रमुख

इसी तरह अकेले रह रहे 50 वर्ष से ज़्यादा उम्र के पुरुषों की तादाद कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत था पर 30 दिनों की समयावधि में ऐसी बीमारियों से मरनेवालों की कुल तादाद में इनका प्रतिशत दो तिहाई तक था।

ऐसा पाया गया है कि जो लोग अपने साथी के साथ जीवन बिता रहे हैं, अच्छी शिक्षा प्राप्त हैं और कामकाज में ख़ुद को व्यस्त रखते हैं, उनमें इस तरह के ख़तरे की आशंका सबसे कम होती है.
और तो और, तलाकशुदा महिलाओं में भी इस तरह की बीमारियों का ख़तरा तुलनात्मक रूप से कम ही था.
ऐसा देखने को मिलता है कि अधिक कॉलेस्ट्राल और धूम्रपान जैसी समस्याएँ उन लोगों में ज़्यादा पाई जाती हैं जो कि अकेले रहते हैं.
ऐसे लोगों को सामाजिक सहयोग भी कम ही मिल रहा होता है और ये लोग अपने पारिवारिक चिकित्सकों के पास भी कम ही जाते हैं.
शोधकर्ताओं का नेतृत्व कर रहे डॉक्टर क्रिस्टीन नेल्सन कहते हैं, "दिल की बीमारियों का ख़तरा उन लोगों में ज़्यादा है जो कि अकेले रहते हैं. हालांकि कुछ और भी वजहें हो सकती हैं जिनकी हम अभी तक पड़ताल नहीं कर पाए हैं."
ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के प्रवक्ता एलेन मासन भी मानते हैं कि अकेले रहने वालों के लिए उनकी तन्हाई से भी बड़ी समस्या उनकी जीवनचर्या है जिसमें उचित और अच्छा आहार न लेना और अधिक धूम्रपान करना शामिल है.

Monday, April 7, 2008

याहू और रेडिफ पर हिन्दी कैसे पढ़ें

मैं इन दिनों नेट पर हिन्दी में एक प्राब्लम फेस कर रही हूं, जीमेल से जब यूनीकोड में हम हिन्दी में याहू या रेडिफ पर मेल कर रहे हैं या पत्रकारों की एक साइट से तो ये मेल वहां पर फोन्ट करप्ट होकर दिखा रही है। हम लोग यूनिकोड में लिख कर मेल कर रहे हैं पर ये दूसरी मेल पर क्यों नहीं दिखा रहा। कृपया कोई इसका तोड़ बताएं कि हम किसी भी मेल याहू या रेडिफ पर भी हिन्दी में पढ़ सकें या लिख सकें। जीमेल पर यह प्राब्लम नहीं आ रही ।

Friday, April 4, 2008

....और अब कुछ खरी-खरी

जब मैं अजदक की इस पोस्ट पर कमेंट कर रही थी तो मैं पोस्ट पढ़ कर हंसी थी और लिंक पढ़ कर दुखी हुई थी। शायद इसी का परिणाम था। लेकिन वो बात जो शायद सबको बहुत तकलीफ दे रही है कि ये इंडिया है बाबू। यहां पर मैं बात साफ कर दूं कि जब मैं ये बात कहती हूं तो मैं केवल अपनी बात नहीं करती। मैं प्रतिनिधि हूं अपने समय की , अपने जैसी हजारों औरतों की। पर सच तो ये है कि मैं उन करोड़ों औरतों की प्रतिनिधि हूं जिनकी आवाज तो सुनी भी नहीं जाती। रचना को ये बात बहुत चुभी , क्यों औरतें अपनी पति की गलत-सही बात सुन लेती हैं सह लेती हैं। आपके पास दूसरे बहुत से आप्शन होते हैं।लेकिन रचना एक बात है जो मुझे अजीब लगती है , हमारे देश में कितने महिलाएं आपके मेरी जितनी फोरचुय्नेट होंगी, जो एजुकेटेड हैं, फाइनेंशयली इन्डिपेंडेंट हैं। अपने फैसले खुद ले सकती हैं, शादी के भी और शादी से अलग होने के भी। किनती महिलाएं हैं जिन्हें घर-आंगन की देहरी भी नहीं लांघने दी जाती। जो स्कूल में तख्ती पकड़ने को तरसती रह गई होंगी पर उन्हें गोबर भरी तगारी पकाड़ी दी गई होगी। वो जानती होंगी उनके पति उनके अलावा बहुत सी दूसरी औरतों और प्रोस्टिट्यूट्स के साथ इन्वोल्व हैं पर वो उनसे जवाब तलबी कर के दो चार हाथ खा कर बैठ जाती होंगी।

आज सुबह ही हंस में अरूंधति राय का इन्टरव्यू पढ रही थी, वो कहती हैं 90 के दशक के बाद से भरात में एक बड़ा बदलाव आया है, यहां की अपर मिडिल क्लास और अपर कास्टस् का एक बड़ा दल बिलकुल अलग होता जा रहा है। उसकी आकांक्षाएं अलग हैं, उसका मीडिया अलग है, उसकी चाहत अलग है, उसके माल्स अलग हैं। दूसरी तरफ वो भारत है जो दो वक्त की रोटी के लिए लड़ता है। अपर क्लास की चिंताए अलग हैं, उन्हें जस्टिस फार जेसिका जैसे आंदोलन तो समझ में आते हैं लेकिन रोटी के लिए आंदोलन समझ में नहीं आता।

मैं उस इंडिया की बात करती हूं , जहां पर पढ़ाई के लिए स्कूल जाने की इजाजत नहीं है, अपने मन की बात करने की इजाजत नहीं है, वहां पर पति की बेवफाई पर उन्हें प्रश्न कौन उठान देगा। फिर भी वो उठाने की कोशिश करेंगी तो उनकी आवाज गले में ही दबा दी जाएगी।

ये प्रश्न हैं जो रचना उठाती हैं और उन्हें लगता है जो महिला आज ये कह रही है कि ये इंडिया है वो दस साल बाद अपने पति द्वारा किए गए अत्याचारों को दुनिया भर में सुनाकर उसका रोना सबके सामने रोएगी। रचना यहीं पर आकर आप और मैं अलग हो जाते हैं, शायद मैं अपने पति से एक गाली खाने से पहले क्या कर दूंगी और उसका अंजाम क्या होगा ये वो खुद भी नहीं सोच सकते।

रिश्ते निभाए जाते हैं उनकी लाश ढोई नहीं जाती, जब ये आपके गले में फांसी लगाने लगें तो आप उस कच्चे धागे को तोड़ देते हैं। पर ये सच सिर्फ कुछ हजारों का हो उन कुछ करोड़ों का नहीं है जो नहीं जानती कि रिश्ते कब मर कर सड़ांध मारने लगे हैं पर उन्हें इन्हें ढोना ही है और यही उनकी त्रासदी है। पर मैं ये जरूर चाहूंगी कि बहुत जल्दी ही मैं ऐसे देश में सांस लूं जहां अंतिम महिला तक ये फैसला ले सके कि उसे अपने रिश्तों को कैसे निबाहना है।

Saturday, March 29, 2008

घर का जोगी जोगना



राजस्थान स्थापना दिवस समारोह में खो गए राजस्थानी




इन दिनों जयपुर में राजस्थान स्थापना दिवस समारोह चल रहा है। एक सप्ताह के इस कार्यक्रम में राजस्थान की स्थापना को सेलिब्रेट किया जा रहा है। इस दौरान बहुत से कार्यक्रम आयोजित हुए। फोटोग्राफी की एग्जीबिशन, शास्त्रीय नृत्य ( बिरजू महाराज और मल्लिका साराभाई सरीखे कलाकार । ) फूड फेस्टिवल, क्राफ्ट फेस्टिवल, थिएटर फेस्टिवल और भी ना जाने क्या-क्य़ा। सबसे ज्यादा भव्य और खर्चे वाला कार्यक्रम किया गया, म्यूजिकल नाइट। जिसमें बालीवुड की हस्तियों को बुलाकर उन्हें गवाया नचवाया गया। फिल्म उद्योग से काफी बड़े नामों को इकट्ठा किया गया। ए आर रहमान, हेमा मालिनी, सुनिधि चौहान ।


पर एक बात जो हम सब को कचोटती रही वो थी कि इस पूरे कार्यक्रम में राजस्थान और राजस्थानी कहां थे।




यही बात इन कार्यक्रमों के कवरेज के दौरान बहुत से दर्शकों ने भी मुझसे कही। वो कहते हैं जब ये राजस्थान का अपना कार्यक्रम है तो हमारे लोग कहां है। हमारी संस्कृति हमारे कलाकार कहां है।राजस्थान जिसके गीत संगीत का लोहा दुनिया मानती है उसे प्रदेश के कलाकारों और संगीत की अनदेखी की गई। बालीवुड के तेज संगीत और रोशनियों में कहीं हमारे लंगा मांगणीयार खो गए। हमारे ढफ, अलगोजे की धुनें आर्केस्ट्रा के तेज आवाजों में दब गईं। ईला अरूण और विश्व मोहन भट्ट सरीखे कलाकार चिल्ला चिल्ला कर कहते रहे कि हम राजस्थानियों की पूछ करना कब सीखेंगे पर फिर भी कोई सुनवाई नहीं।थिएटर महोत्सव के लिए सभी प्रोडक्शन हाउस राजस्थान से बाहर से बुलाए गए, शहर के रंगकर्मियों ने काली पट्टी बांधकर इसके विरोध में प्रदर्शन भी किया लेकिन वही ढाक के तीन पात । लेकिन अपने ही घर में उपेक्षा का यह दौर कब अक चलेगा।
वो कहते भी हैं ना

घर का जोगी जोगना
बाहर का जोगी सिद्ध