Saturday, December 31, 2011

साल छूटे तो भी यादें छूटा नहीं करतीं...


एक और साल गया, आखिरी दिन जाते जाते कैसी अजीब सी नास्टलेजिक फीलिंग दे जाता है। जैसे किसी के दूर चले जाने के, किसी के छूट जाने की। खासतौर पर तब जब आप उसी समय बार बार जगजीत सिंह की आवाज में हाथ छूटे तो रिश्ते नहीं छूटा करते सुन रहे हों, एक तरफ साल जा रहा हो और एक तरफ हम छूटने की बातें कर रहे हों। पार्टी औऱ ऑफिस के बीच में संध्या का यह अजीब सा वक्त है, जैसे गले में कुछ अटका हो। बहुत पेनफुल सी फीलिंग, हालांकि क्यूं है ये समझ नहीं आ रहा। बाकी सालों जैसा यह साल भी गुजर गया। अच्छे बुरे हर तरह के दिनों के साथ।



इस साल में भी कुछ दिन थे, कुछ पल थे, जो जिन्दगी भर याद रहेंगे और कुछ ऐसे जिसे कभी याद नहीं आना है। छूटने और नया मिलने की इस अजीबोगरीब स्थिति के बीच से हम फिर निकल जाएंगे। एक बार फिर नए साल का गले लगाकर मुस्कुराते हुए स्वागत करेंगे और जैसे हर नए बदलाव के साथ किया ही जाना चाहिए। दिसंबर में एक पोस्ट करना ही चाहती थी पर ये नहीं पता था कि जाते जाते आखिरी दिन ये होगा...खैर।


आने और जाने के इस संधिपल के बीच हैप्पी न्यू ईयर

Happy New Year

Monday, November 14, 2011

तीन दिन दो किताबें और एक मूवी


मूवीज बहुत कम देखती हूं पर सोचा न था और जब वी मैट के बाद से मैं इम्तियाज की ऐसी फैन हुई कि उसकी मूवीज रेजिज्ट ही नहीं कर पाती। लम्बे अरसे के बाद नरेन्द्र के साथ मूवी का प्रोग्राम बना और इस संडे मूवी का प्रोग्राम फाइनल कर ही दिया। एज युजअल मूवी बहुत ही खूबसूरत है, नदी की तरह बहती हुई। आप इसमें खो जाना चाहते हैं लेकिन इंटरवेल के बाद मूवी एकदम धीमी पड़ जाती है, यूं लगता है कि फिल्मकार का ग्रिप छूट सा गया है।


पहले हाफ में जनार्दन जाखड़ का कैरेक्टर जितना मजेदार है, सेकेंड हाफ में वो उतना ही जिद्दी और जूनूनी। सेकेंड हाफ में बहुत से सीन्स में इम्तियाज समझा ही नहीं पाते कि उनका नायक क्या करना चाह रहा है और क्यों। वो किस समय जेल से बाहर आ रहा है कब जा रहा है कब उसके शोज हो रहे हैं। ये सब इतना गड्ड मडड् है कि पहले हाफ तक हर दर्शक जो उसे बेहतरीन फिल्म बताता है वो बाद में भटकने लगता है। शायद इसीलिए मेरे आसपास से भी सेकेंड हाफ में काफी लोग उठ कर चल दिे।



डूबा डूबा रहता हूं के जमाने से ही मोहित चौहान की आवाज सराही जाने लगी थी लेकिन रॉक स्टार ने उन्हें उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जो वो डिजर्व करते हैं। कहीं कहीं उनकी आवाज रूहानी लगती है, जैसे शम्मी कपूर कहते हैं कि यह बड़ा जानवर है तुम्हारे पिंजड़े में नहीं आएगा। ए आर रहमान का संगीत दिलकश है। रणबीर की एक्टिंग हर फिल्म के साथ निखर रही है। नरगिस बेहद खूबसूरत है लेकिन वही कैटरीना के लिए जो फीमेल वीओ आर्टिस्ट डब करती थी, उसीसे नरगिस की आवाज डब करवाई गई है। ऐसे में वो कहीं न कहीं फिल्म से अलहैदा बनी रही(एटलिस्ट मेरे लिए )


इस वीकेंड में मूवी के साथ साथ दो किताबें भी रहीं, एक तो चेतन भगत की रेवूल्योशन 20 20 जो मैंने काफी दिन पहले खरीदी थी और उस आधी पढ़ कर छोड़ दिया था। उसे निपटा दिया है। इस किताब के बारे में मैं यही कह सकती हूं।


इसके अलावा इस्मत चुगतई की कुछ कहानियों का संकलन था, सिर्फ परसों शाम में आधे से ज्यादा पढ़ गई। मुझे वही सब पढ़ने में मजा आता है जिसे मैं पढ़ती जाऊं, जो मुझे बांध ले। सामने टीवी पर मेरी पसंदीदा फिल्म आ रही हो या कोई कंट्रोवर्सी। रसोई खाना पकाने के लिए मेरा इंतजार कर रही हो। पर जो किताब मैं एक सिटिंग में पढ़ जाऊं उसका असर देर तक दिमाग में बना रहता है। इस्मत आपा की कुछेक कहानियां यहां वहां पढ़ी हूं, उनकी बायोग्राफी भी दो-तीन मर्तबा पढ़ चुकी हूं, पर मैं उन्हें जितना पढ़ती हूं, उतनी ही उनकी कायल हो जाती हूं। आज से तकरीबन 60-70 साल पहले वो इतना खुल कर कैसे लिख पाती होंगी। वो समाज से लड़ने की हिम्मत अपनी बात कहने का जज्बा कहां से आता होगा। हैट्स आव टू हर। वो गजब हैं, हालांकि उनकी भाषा में उर्दू का काफी उपयोग है, जो अब कम होने की वजह से कुछ शब्दों में अटकी हूं। पर वो ऐसे धाराप्रवाह लिखती हैं ऐसा लगता हैं जैसे सामने बैठ कर किस्सा सुना रही हों। उनकी सभी कहानियां जमीन से जुड़ी हुई एकदम आसपास के लोगों की कहानियां है, शायद हमारी आपकी, हम सबकी कहानियां।

Wednesday, October 5, 2011

बिज्जी हमारे लिए नोबेल पुरस्कार विजेताओं से बढ़कर हैं


राजस्थान के कुछ ही साहित्यकार हैं जिन्हें मैं पढ़ती हूं, बल्कि यूं कहूं पढ़ती नहीं सीधे दिल से पढ़ती हूं क्योंकि उनकी कहानियों में वो बात है जो आपको बांधे रखती हैं। अपनी मिट्टी से जुड़े होने के अहसास को ताजा रखती है। पता नहीं वो क्या अपनापन होता है विजयदान देथा की बातों में उनकी कहानियों में वो अपने से लोग, वो अपनी सी भाषा बोली खानपान और भी पता नहीं क्या क्या। हालांकि मेरा उनका किताबों से परिचय कुछ ही साल पुराना है। लेकिन जब से मैंने उन्हें पढ़ना शुरू किया है तब से मेरे किताबों की खरीदारी में उनकी किताबें एक अहम भाग होती हैं।


बिज्जी मेरे सबसे पसंदीदा लेखकों में से इसलिए भी हैं कि वो उन बहुत कम पुरुषों में से हैं जो महिला की मन की बात को समझते हैं। वो क्या सोचती हैं, वो कैसे चीजों को देखती हैं। उनकी कहानियों में महिला चरित्र काफी स्ट्रांग हैं जैसे हर महिला अपना वुमनहुड सेलिब्रेट कर रही है। कल मैं अपनी एक पुरानी सीनियर से बात कर रही थीं वे पर्सनली उनसे मिली हैं, वो जितना अच्छा लिखते हैं उतने ही मजेदार इंसान भी हैं।


शायद एक और कारण है भी जिसकी वजह से वो मुझे बेहद पसंद है, मेरे पति नरेन्द्र का लिटरेचर में दूर दूर तक कोई इंट्रेस्ट नहीं है और मेरी किताबें सिर्फ मेरी हैं वाली तर्ज पर सारी किताबें सिर्फ मैं ही पढ़ती हूं। (मेरे चेहरे पर कैसी शैतानी मुस्कुराहट है, सोच भी नहीं सकते) खैर तो एक बार नरेन्द्र ने उनकी एक कहानी पढ़ डाली और मेरे पास जितनी किताबें विजयदान जी की थी सब पढ़ डाली।


एकाध दिन में नोबल पुरस्कार का फैसला हो जाएगा। उन्हें मिलेगा या नहीं पता नहीं। लेकिन हमारे लिए वो सभी नोबेल पुरस्कार विजेताओं से बड़े हैं क्यूंकि वो हमारे बिज्जी हैं ौर हम सब उनकी कहानियों से बेहद प्यार करते हैं।

Wednesday, September 21, 2011

रानियों के लिए शहर के बीचो-बीच बना हवाघर

हवामहल, नाम ही से लगता है वो महल जहां चारों तरफ हवा ही हवा हो। तभी तो जयपुर राजघराने ने सदा परदे में रहने वाली अपनी रानियों के लिए शहर के बीचोंबीच ये भव्य महल बनवाया था, जहां से गर्मी से तपने वाले जयपुर में भी सदा हवा का अहसास होता रहे।

साथ ही यह रानियां बाजार, त्योहार और शाही सवारियों को इन झरोखों से देख सकें जबकि बाहर खड़ी जनता को ये भी न पता चले कि रानियां भी इन उत्सवों का आनंद ले रही हैं।


हवामहल का निर्माण 1799 ई0 में सवाई प्रताप सिंह द्वारा करवाया गया था। प्रताप सिंह भगवान कृष्ण के उपासक थे और भगवान कृष्ण के मुकुट से प्रेरित होकर उन्होंने लालचंद से हवा महल का डिजायन करवाया था। हवामहल में 953 छोटे बड़े झरोखे हैं।


(दैनिक भास्कर डॉट कॉम से साभार)

Saturday, September 17, 2011

गायब भंवरी का पति उर्फ रीयल लाइफ नत्था


पिछले कुछ दिनों से पूरे राजस्थान बल्कि यूं कहे कि पूरे हिन्दी बैल्ट में एक महिला की चर्चा हो रही है, भंवरी देवी। नाम भी हुआ तो कब जब वो गायब हो गई। तो ये भंवरी देवी जिनके बारे में ये कहा जाता है कि इन्होंने राजस्थान के एक कद्दावर नेता और मंत्री के साथ अपनी एक सीडी बना ली थी और इसी सीडी के दम पर वो लगातार समृद्ध से समृद्धतर होती जा रही थी। (एक नया शब्द गढ़ने के लिए माफी हालांकि ये ग्रामेटिकली गलत है) जी तो बात हो रही थी भंवरी की, पेशे से एक मामूली सी एएनएम (नर्स का असिस्टेंट टाइप पोस्ट बना रखा है राजस्थान सरकार ने, टीचर को नौकरी दो मत विद्यार्थी मित्र बनाओ, नर्स भर्ती करो मत, एएनएम लगाओ)


भंवरी जो दिखने में अच्छी खासी थी या हैं, (जो भी है) तो उसकी चाहत थी कि वो माडल या हीरोइन बन जाए, कुछेक बड़े लोगों से संपर्क बनाए गए और उसके लिए कुछ राजस्थानी वीडियोज भी बनवाए गए, जहां वो दिखी, इसके बाद उसे एएनएम की सरकारी नौकरी भी दिलवाई गई.


...अब बात मंत्री जी की

मंत्रीजी एक राजनीतिक परिवार से आते हैं जो सरकारी मुखिया के धुर विरोधी माने जाते हैं। मंत्री जी इस नटणी से प्रेम में क्या पड़े, उस पर जब तब पैसा तो लुटाते ही थे, एक दिन सीडी बनी तो खुद ही लुट गए। लेकिन पावरफुल थे सो सीडी कों कई सालों तक दबवाए रखा। वैसे ये बता दू कि सीडी कई साल पहले बनी थी। ये सीडी बनी थी राज्य के कुछ और प्रभावशाली मुख्य नेताओं के कहने पर। जिससे कि मंत्रीजी को उनकी औकात में ही रहने दिया जाए।....और वैसा हुआ भी, सीडी अपना काम कर गई और मंत्रीजी चुप कर गए।

.....तो भंवरी किस भंवर में फंसी

नट जाति के बारे में कहा जाता है ये काफी खुले विचारों वाले लोग हैं, यानीकी अमेरिकन कल्चर इन आवर ओन बैकवार्ड राजस्थान। तो इस खुले विचारों वाली खूबसूरत नटणी के साथ एक और प्राब्लम थी कि वो काफी महत्वकांक्षी थी, रिच एंड फेमस होने के लिए शार्टकट किसे बुरे लगते है, उसे भी नहीं ही लगे होंगे, तो सीडी तो इन्होंने बनवा ली। कुछ कुछ पैसा भी मंत्री जी, उनके चाहने वालों और न चाहने वालों से भी आता रहता था, पर इतना काफी नहीं था। तो उसने सोचा ये दूसरे बड़े लोग तो सीडी का इस्तेमाल करते नहीं, क्यूं न खुद ही किया जाए। तो सीडी से इन्होंने भी काफी पैसा कमाया लेकिन समय का पहिया घूमा और फिलहाल स्थिति ये है कि कोई नहीं जानता कि भंवरी कहां है।

....आखिर कीमत चुकानी पड़ी रीयल लाइफ नत्था और उसकी धनिया को


भंवरी का पति उर्फ रीयल लाइफ नत्था 10 साल पहले भी ड्राइवर था, सो आज भी है। जबसे पत्नी गायब हुई है, बच्चों को देखने वाल कोई नहीं। सदियों से जो होता आया है वही अब भी हुआ। बड़े लोगों की लड़ाई में पिसना पड़ा इन गरीबों को और वो भी औरत को। बड़े लोगों की आपसी खींचतान तो चलती रहती है, सो चल रही है। उनके आरोप प्रत्यारोप चालू हैं और हमाम में सब नंगे हैं। इसिलए खुल कर कोई किसी के खिलाफ बोल नहीं रहा है न किसी से पद छिनना, न जेल भेजना और न कोई और कार्रवाई।
इस बेचारी औरत को अपनी जान गंवानी पड़ी, सच तो यही है कि वो 15 दिन से गायब है और आशंका यही है कि उसकी हत्या कर दी गई है।

भंवरी के पति यानी रीयल लाइफ नत्था के चेहरे पे बेबसी के वो भाव नजर आता है कि बेचारे को काटो तो खून नहीं। इतना सब हो जाने के बाद वो जिए या मरे ये उसे भी समझ नहीं आ रहा। सो फिलहाल रीयल लाइफ नत्था ने भी फिल्मी नत्था की ही तरह अपनी बात न माने जाने तक आत्महत्या करने की धमकी दे डाली है, शायद इसी से उसके परिवार का कुछ भला हो जाए। उधर, उसकी समझदार जोरू धनिया शायद बड़े लोगों से जुड़ने की कीमत अपनी जान से चुका चुकी है।

...तो ये थी रीयल लाइफ नत्था और उसकी समझदार बीवी और सीडी की कथा, फिलहाल ये अधूरी है पर पहला अध्याय इतना ही बयां कर सकता है।

अथ श्री सीडी कथाय नमः

Friday, August 26, 2011

सौ बार सोचिए कि हम चुन किसे रहे हैं?

संसद गर्माएगी। करेगी बहस। लोकपाल पर। सरकारी नहीं। हमारे भी। जन लोकपाल। जनप्रतिनिधि बोलेंगे। प्रशंसा करेंगे - अन्ना की। जनता की। अभियान की। बधाई देंगे - धैर्य पर। शांति पर। अहिंसा पर। फिर बरसेंगे - भ्रष्टाचार पर। खामियों पर। सरकार पर। खुद पर। खुद पर? जी, हां। ऐसा होगा। उदाहरण देंगे। नाकामी के। लोकपाल नहीं। 42 बरस। 9 बार पेश। 23 बहस। यही संसद। वही सांसद। लोकपाल मांगा। बिल बनाए। पेश किए। विफल किए। फिर लाए। फिर खारिज। वही दल। वही नेता। नए तथ्य। बदले तर्क। गलत नहीं। थोपे नहीं। बाकायदा जीते। हमने जिताए। चौंकिएगा नहीं। सिर्फ सोचिएगा। सौ बार। कि आप चुन किसे रहे हैं?


कमी क्या? लाखों लोग। अनूठी एकता। सभी दृढ़। नेतृत्व पवित्र। अनुयायी प्रतिबद्ध। अहिंसक जनसैलाब। राह पता। दिशा तय। लक्ष्य साफ। तो क्या? कमजोर कहां? कहीं नहीं। कमजोरी नहीं। व्यवस्था अलग। सिस्टम कहिए। संसद हो। विधानसभाएं हों। नगर निगम। पंचायतें हों। नाम कोई। वही चलाएंगे। हम नहीं। हम चुनेंगे। वे चलाएंगे। सिस्टम को। सदनों को। सरकार को। हमें भी। हमें ही। स्पष्ट है। कमी नहीं। लाखों हों। करोड़ों हों। फर्क नहीं। वे चलाएंगे। वे बनाएंगे। नियम, कायदे। लोकपाल लाएंगे। जनलोकपाल सुनेंगे। भ्रष्टाचार हटाएंगे। भ्रष्टाचार बढ़ाएंगे। गलत नहीं। व्यवस्था है। हमने बनाई। या बनवाई। चौंकिएगा नहीं। सिर्फ सोचिएगा। सौ बार। कि आप चुन किसे रहे हैं?


तो जनक्रांति? क्या महत्वहीन? करोड़ों लोग। सिर्फ भीड़? और राष्ट्रहित। सिर्फ भाषण? सामाजिक-आर्थिक बदलाव। सिर्फ सपना? ऐसा नहीं। जनक्रांतियां सर्वश्रेष्ठ। लोग सर्वोच्च। तो क्या? कमी कहां? कहीं नहीं। स्वतंत्रता संग्राम। महानतम जनक्रांति। विश्व में। सबसे बड़ी। सबसे लंबी। क्योंकि तय। लक्ष्य तय। अंत तय। सबको पता। सेनानियों को। हिंदुस्तानियों को। फिरंगियों को। दुनियाभर को। अंग्रेज हटेंगे। नहीं चौंकी। दुनिया मानी। क्योंकि देश ने, आजादी के मतवालों ने सौ बार सोच लिया था। अंग्रेजों को भगाने के लिए गांधी को चुना था।


सिद्ध हुआ। अंत पता। तो महान्। पता नहीं। तो व्यर्थ। उदाहरण हैं। अरब देश। उत्तरी अफ्रीका। एकदम ताजा। ट्यूनीशिया टूटा। मिस्त्र मटियामेट। लीबिया लावारिस। देखिए क्यों? तैयारी नहीं। तख्त पलटे। शासक नेस्तनाबूत। यूं सफल। लेकिन विफल। विकल्प नहीं। अंत नहीं। बची अराजकता। साफ है। सोचा नहीं। कि यह लड़ाई लड़ने के लिए चुन किसे रहे हैं। फिर लौटें। लोकपाल पर। आज पर। नए प्रश्न। इतनी देरी? सरकार निडर। ऐसा क्यों? दो कारण।


विपक्ष साथ। पक्ष अटूट। सरकार मजबूत। चुनाव दूर। काफी दूर। सरकार मजबूत। तो जनहित? और राष्ट्रहित? तय कीजिए। अगली बार। चूंकि हम 121 करोड़ नागरिक इकट्ठे भी हो जाएं तो व्यवस्था हाथ में नहीं ले सकते। किसी को सौंपनी ही होगी। जैसे जनक्रांति के लिए अन्ना श्रेष्ठ चयन हैं। वैसे ही जनप्रतिनिधि के लिए सौ बार सोचिएगा कि आप चुन किसे रहे हैं? भास्कर जगाएगा। हमेशा जैसे।

(लेखक दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर हैं)।

Thursday, August 25, 2011

इस दमन को आने वाली पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी


यह दैत्याकार धक्का है। सरकार ने दिया है। कल लगा वह अन्ना हजारे का मान रखेगी। लगा क्यों? सरकार ने खुद कहा था। देर रात करोड़ों जन के मान मर्दन पर उतरे से दीखे मंत्री। राष्ट्र को दिया दंभपूर्ण उत्तर : ‘अन्ना का अनशन समस्या है। हमें पता नहीं।’ तो किसे पता है? ऐसे दमन को कौन माफ करेगा? क्यों अचानक बदल गए सरकारी तेवर?

कल तक सरकार को शक था कि वह अकेली है। अब सभी पार्टियों को बुलाकर बात की तो ‘धक्क’ से रह गए। सारे नेता, दलगत राजनीति से तत्काल ऊपर उठकर एक स्वर में एकजुट होते नजर आए। एक भी नहीं बोला कि अन्ना वाला जन लोकपाल बिल लाओ। हां, चूंकि विरोधी दल हैं- संसद में सरकारी बिल को कोस चुके हैं- सो फिर से कोस दिया। लेकिन अन्ना को लेकर सिर्फ एक बात : अनशन समाप्त करवाना जरूरी। किसी भी तरीके से। यानी छल से या बल से। बस, इसी विपक्षी एकता से बल मिला सरकार को। और उसकी आवाज इतनी खुरदुरी हो गई, यकीन न हुआ। वार्ता में शामिल किरण बेदी के शब्दों में ‘प्रणव मुखर्जी तो ऐसा बर्ताव कर रहे थे कि हम उनसे बात करने पहुंचे ही क्यों हैं।’ हल ढूंढना तो दूर, अन्ना के साथियों को फटकार तक लगाई सरकार ने। हालांकि देर रात, जैसा कि होना ही था, मुखर्जी इससे पलट गए। जन भावनाओं से ऐसे खिलवाड़ को क्या संवेदनशील लोग माफ करेंगे?


क्यों हो गए सारे विपक्षी दल एकमत?

ज्यादा गहराई में उतरने की जरूरत ही नहीं है। सर्वदलीय बैठक से ठीक पहले संसद के दोनों सदनों में सांसदों ने खुद ही सब साफ कर दिया। सांसद मानो बरस रहे थे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध में सक्रिय लोगों पर। हम सब पर। चीख रहे थे कि क्या लोकपाल भगवान के यहां से आएगा? फ्लैशबैक देखें तो यही भाषा सरकार की थी, कपिल सिब्बल शब्दश : यही बोले थे। सरकार, वो भी ऐसी सरकार जिसके एक के बाद एक मंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नजर आ रहे हों, जेल जा रहे हों,- उनकी हूबहू नकल विपक्षी करें, यह बिरला अवसर ही तो है। वो भी आवाज, अंदाज और मकसद सभी में। विरोधी दल इसलिए ऐसा कर रहे हैं क्योंकि उन्हीं के शब्दों में ‘कुछ लोग लोकसभा को खत्म करने के षड्च्यंत्र में जुटे हैं, राज्यसभा दिखलाई ही नहीं देगी, अगर ये सफल हो गए।’ ऐसा इसलिए क्योंकि अन्ना के अनुयाइयों ने सांसदों को घेरना शुरू कर दिया है। घिरने से बिफरे विरोधी दल इसलिए भ्रष्टाचार पर सरकार के साथ हो लिए। क्या मतदाता ऐसे विरोधी दलों को माफ करेगा? क्यों भरोसा करेगा अब देश सरकार पर?


फिलहाल किसी को किसी पर भरोसा न तो बचा है, न ही जरूरत है। ऐसे माहौल में लोगों को किसी मंत्री, नेता, किसी इंसान पर भरोसा करना ही नहीं चाहिए। सिर्फ कागजात पर भरोसा करना चाहिए। जुझारू बुजुर्ग गांधीवादी को अपने लिए लड़ते देख एक कृतज्ञ देश और उसकी पीढ़ियां क्या ऐसी कृतघ्न सरकार को माफ कर पाएंगी?

(लेखक दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर हैं।)

Thursday, August 18, 2011

...वो गुलजार का तिलिस्म जो आज तक नहीं टूटा


आज गुलजार साहब का 76वां जनमदिन है, गुलजार साहब को तबसे सुनते आ रहे हैं जब शब्दों के अर्थ समझ नहीं आते थे, तब ये नहीं पता था कि नूतन अपना गोरा रगं कैसे किसे को दे सकते हैं। या पानी गीला कैसे हो सकता है लेकिन आरडी, गुलजार और आशा की तिकड़ी की बडी जबरदस्त फैन थी। उनकी गजलें, उनके प्राइवेट एलबम्स जो जहां मिलता था , उठा लिए जाते थे। वैसे गुलजार का फैन मुझे मेरे बड़े भैया ने बनाया वो पंचम दा के बड़े फैन थे और उनकी मौत के बाद उनकी याद में काफी कैसेट्स आए थे. भैया वो सारे कैसेट्स ले आते और हम अपने टीनएज में वो सब सुनते जो थोड़ा दिमाग समझता था और बाकी सारा दिल।


मजेदार बात ये थी कि आर डी बर्मन को सुनते सुनते पता चला कि ज्यादातर गीत गुलजार के ही हैं और अपने को तो संगीत से ज्यादा शब्दों में ही मजा आता था। गुलजार से परिचय बहुत बाद में था पर ये पता था कि ये कौन गीतकार है जिसकी शब्दों से ऐसी दोस्ती है। जो शब्दों के साथ खेलता है, खाता है , सोता है। या उसकी पूरी दुनिया शब्दों के इर्द गिर्द ही घूमती है। वो एक तिलिस्म था जिसमें मैं बंधती जाती थी, जितना निकलने की कोशिश करती थी उतनी ही धंसती चली जाती थी।



ये टीनएज के वो दिन थे जब कोई चीज आपके दिलो दिमाग में बस जाए तो जिन्दगी बीत जाती है पर वो जादू नहीं बीतता। ऐसे ही गुलजार के गीतों के प्रेम में खुद तो जिया है मैंने। उन्हीं के गीतों की मिठास में डूबी उनके जन्मदिन की उन्हें बहुत बहुत बधाई।


तेरे गम की डली उठा कर जबां पे रख ली है मैंने
ये कतरा कतरा ही पिघल रही है

...और मैं कतरा कतरा ही जी रही हूं




या फिर इजाजत का वो गीत

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास रखा है...

इसी की एक लाइन


...एक अकेली छतरी में जब
आधे आधे भीग रहे थे

आधे गीले आधे सूखे

सूखा तो मैं ले आई

गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो




खैर, टीनएज की बातें उसी उम्र के साथ बीत जाती हैं लेकिन मैं गुलजार साहब के चाहने वालों में तब भी थी और आज भी हूं। इसी दौरान एक बार उनके साथ एक इंटरव्यू और मुलाकात का मौका मिला, जो आज भी मेरे जेहन में एकदम ताजा है। इंटरव्यू तब ब्लॉग पर डाला भी था...फोटो उसी पोस्ट से साभार










Thursday, August 11, 2011

...आजकल मैं बैलगाड़ी की सवारी कर रही हूं



न न ये बिलकुल मत सोचिएगा कि मैं किसी गांव में शिफ्ट कर गई हूं, पूरी तरह इस महानगर जयपुर में ही हूं, उसी घर में हूं , उसी कार से आफिस आ रही हूं जिससे पिछले पांच साल से आती हूँ। रास्ता भी एकदम वही है तो फिर ये बैलगाड़ी की सवारी कैसे।


दरअसल मेरे घर जगतपुरा से मालवीय नगर आफिस आते समय मेरे रास्ते के बीच बालाजी मोड़ आता है जो काफी रिस्की है, काफी एक्सिडेंट होते रहते हैं, पिछले दिनों हुए एक जबरदस्त एक्सिडेंट के बाद हमारी पुलिस जागी, ट्रेफिक एसपी दौड़े दौड़े आए, व्यवस्थाएं सुधारने के बजाय उन्हें इसका बहुत ही अजीबोगरीब हल सूझा। क्यों न गाड़ियों की स्पीड कम करवा दी जाए, जैसा कि होता है एक स्पीड ब्रेकर बनवा दिया जाए।


तो जनाब यहां जो स्पीड ब्रेकर बनाया गया वो एक स्पीडब्रेकर नहीं था, वो 6-7 स्पीडब्रेकर्स की एक चेन है। आप एक ब्रेकर से उतरते हैं और दूसरे पर चढ़ते हैं, फिर उससे उतरते हैं तो तीसरे पर तब तक पिछले टायर पहले ब्रेकर पर चढ़ चुके होते हैं। और हमारी कार ऐसे लहराने लगती है जैसे 2-4 ठो पैग लगाई हो।



(ये ओरिजनल फोटो एकदम नहीं है, फिलहाल नेट के सांकेतिक फोटो से काम चलाइए, आज शाम को ओरिजनल फोटो खींचा जाएगा और कल अपलोड किया जाएगा)

कार में हम इतने झटके खाते हैं कि हमें बचपन में शौकिया की गई बैलगाड़ी की सवारी याद आ जाती है तो आजकल रोज आते समय ( न केवल आते समय बल्कि जाते समय भी) मैं मुफ्त में बैलगाड़ी की सवारी का आनंद ले रही हूं। (थैंक्स टू आवर ट्रैफिक एसपी रोहित महाजन )