Thursday, November 19, 2009

स्पेयरिंग फ्यू मोमेंट्स फा‍र चेतन भगत


यूं तो पढ़ने को बहुत ज्यादा टाइम इन दिनों नहीं मिलता , फिर भी चेतन भगत की दो किताबें थीं जो मैं काफी समय से पढ़ना चाह रही थी तो इस बार दिल्ली जाना हुआ तो मैंने सोचा क्यों न रास्ते में दोनों किताबें पढ ली जाएं। तो पहले छूटी हुई किताब वन नाइट एट काल सेंटर का नंबर लगा वो इसलिए भी की क्योंकि लेखक ने भी टू स्टेट्स से पहले यह किताब लिखी है।(टू स्टेट्स अभी रिसंटली पब्लिश हुई है) वन नाइट एट का‍ल सेंटर कहानी है छह लोगों की जो एक काल सेंटर के एक ही सेक्शन में साथ काम करते हैं, और सभी की जिन्दगी सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। ऐसे में वे एक ड्राइव पर जाते हैं औऱ उनकी गाड़ी एक बन रही बिल्डिंग के गड्ढे में फंस जाती है , सबको लगता है मौत आने ही वाली है पर तभी एक फोन बजता है जो भगवान का है ( ओ माय गा‍ड मैं कम से कम चेतन भगत से यह एक्सपेक्ट नहीं कर रही थी) मैं नावेल पढ़ रही थी औऱ मुझे लगा रहा था कि मैं किसी बालीवुड फिल्म की स्टोरी सुन रही हूं। खैर जैसा भी हो भगवान उन सब को कुछ राय देते हैं और उनकी लाइफ वापस ट्रेक पर आ जाती है। भगवान में यकीन करने वाले लोगों के लिए यह स्टोरी गजब है, पर मुझे बिलकुल मजा नहीं आया। इसकी बजाय मुझे टू स्टेट्स थोड़ी ठीक लग रही है, जिसका पढ़ना फिलहाल जारी है. पर इन दिनों समयाभव के कारण उसके अंतिम कुछ पन्ने बचे हैं जिस दिन पढ़ती हूं उस दिन उसके बारे में लिखूंगी।
..और हां पता नहीं क्यों चेतन भगत की हर किताब में नायक खुद को लूजर लूजर बताता अंत में सब कुछ पा जाता है मन पसंद लड़की, मां बाप का साथ औऱ ढेर सा पैसा गजब है न। तभी तो बालीवुड डायरेक्टर्स उसकी कहानियां फिल्में बनाने के लिए रेजिज्ट नहीं कर पाते। हालांकि वन नाइट एट काल सेंटर पर बनी मूवी हैलो या ऐसा ही कुछ नाम था, डिजाजस्टर थी. बाप रे आप अमृता अरोड़ा और सुहेल टाइप लोगों को कैसे झेल सकते हैं। शायद अतुल अग्निहोत्री ने बनाई थी तो ऐसी ही होनी थी।
चेतन की स्टोरी पर बेस्ड एक और मूवी आने वाली है थ्री इडियट्स जो उनकी पहली किताब फाइव पाइंट्स समवन पर लिखी है जो आज भी मुझे उनकी बेहतरीन किताब लगती है। दिल से और पूरी इमानदारी से लिखी गई किताब है जहां लगता है कि नायक वाकई लूजर है :-)

Thursday, November 12, 2009

ओल्ड हैबिट्स डाय हार्ड




अकसर जिन दिनों में ब्लाग पर काफी विजिट कर रही होती हूं, उन दिनों सोचती हूं अब रेगुलर लिखूंगी लेकिन फिर वही होता है व्यस्तताएं आती हैं और ब्लाग पर लिखना बहुत कम हो जाता है. सिर्फ लिखना ही नहीं दूसरे ब्लाग पढना तो और भी कम हो जाता है। मेरे फेवरेट ब्लाग जिन्हें अगर मैं नेट पर रहूं तो पढ़े बिना रह ही नहीं सकती. पर इन दिनों काम का प्रेशर इतना जबरदस्त है कि ब्लाग लिखना संभव ही नहीं हो पा रहा है। खैर मैं जानती हूं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और जो लोग आपको रेगुलर पढते हैं और आपसे कम्यूनिकेट करते हैं, उन्हें इसकी आदत हो जाती है। खैर, ये कोई कारण नहीं है और बहाना भी नहीं पर कुछ आदते हैं जो मरने के साथ ही छूटती हैं और मुझे लगता है कि ब्लागिंग इनमें शुमार होने जा रही है.
वैसे भी वो कहते हैं न अंग्रेजी में ओल्ड हैबिट्स डाय हार्ड ये भी वैसी ही आदत हो चुकी है। लेकिन पता नहीं समयहो न हो कुछ मिनट चुरा कर कुछ लाइनें तो लिखी ही जा सकती है जैसा आज कर रही हूं। क्योंकि बहुत दिन की चुप्पी बहुत सी गलतफहमियां पैदा कर देती हैं, ऐसे मेरे एक मित्र कहते हैं। तो उनकी बात पर अमल करते हुए ये चुप्पी तोड़ ही देती हूं। आप सब से बहुत माफी चाहती हूं और कोशिश करूंगी कि थोड़ा सा लिखने का रूटीन बना कर रखूंगी और अगली बार ये जरूर बताऊंगी कि इन दिनों क्या पढ़ा और उसका क्या असर रहा।
लेकिन अपने ब्लाग से भी ज्यादा दुख उन कम्यूनिटी ब्लाग्स के लिए होता है जिनसे न जाने कब से जुड़ी हूं पर कभी लिखती ही नहीं हू। चाहती हूं तब भी नहीं लिख पाती, वही कब वक्त का बहाना तो कभी विषय का।

(चित्र फ्लिकर से साभार )

Saturday, October 31, 2009

नाकारा नेता और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी


जयपुर की आग ने जहां इतनी बड़ी कंपनी के सुरक्शा दावों की पोल खोल कर रख दी है साथ ही हमारे नाकारा नेताओं और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी की सच्चाई भी सबके सामने ला दी है।
आखिर कैसे लाखों लीटर तेल घनी आबादी एरिया में रखने की इजाजत दे दी । अगर यह जगह आयल डिपो को पहले आवंटित की गई थी तो वहां कैसे इंडस्ट्रियल एरिया और रिहायशी एरिया डवलप होने दिया गया।
आयल डिपो में लाखों लीटर तेल था तो उसे बुझाने के इंतजाम क्यों नहीं थे?
सरकारों के सामने ऐसे हजारों प्रश्न है लेकिन हमारे सरकारें उनकी तो कुंभकर्णी नींद ही टूटने का नाम नहीं ले रही। केवल बयान जारी करने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते। ज्यादा हो तो फोटोग्राफरों को और कैमरामैनों को साथ ले जाकर अस्पताल में भर्ती लोगों का हालचाल पूछ लीजिए। हो गई कर्तव्य की इतिश्री।
पेट्रोलियम मंत्री आते हैं औऱ बयान देते हैं जब इन टैंकों का तेल खत्म होगा तभी आग बुझेगी। आखिर आप इतना बड़ा पेट्रोलियम मंत्रालय चलाते हैं जहां ये भी नहीं पता कि इन बड़े बड़े टैंकों में अगर लाग जाए तो उसे बुझाएंगे कैसे। अगर आपको यह नहीं मालूम था तो ये बनाए ही क्यों गए और कैसे इन्हें रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों में चलने की इजाजत दे दी गई। बहुत से सवाल हैं जो हमारे नाकारा नेताओं औऱ भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी के सामने हैं, लेकिन इनके जवाब और समाधान ढूंढने की बजाय ये अपनी मोटी चमड़ी की तरह मोटी चादर ओढ कर सो जाते हैं।
क्यों नहीं तीन दिन में आग बुझाने के वैकल्पिक समाधान ढूंढे गए।
इतनी बड़ी आग लगने के बाद रातों रात स्वायत्त शासन मंत्री नगर निगम को आदेश देते हैं कि स्नार्कल लैडर खरीदी जाए. आखिर आज तक फायर ब्रिगेड के लिए यह ५४ मीटर ऊंची लैडर खरीदने का फैसला क्यों नहीं किया गया।
सवाल बहुत से हैं और सरकारों के पास उनसे बचने के लिए बहुत सी गलियां। अगर मुश्किल कुछ है तो प्रशासन और सरकार के लिए तो वो है ईमानदारी।
अगर ईमानदारी से वो इस तरह की समस्याओं के समाधान समय रहते खोज ले तो शायद कई जानें और हजारों करोड़ का नुकसान नहीं होता।

Friday, October 30, 2009

अपनी आंखों से देखा विनाश का वह दृश्य


जयपुर में लगी भयानक आग की चर्चा तो आज मीडिया सहित हर जगह हो रही है, पर मैं उन चंद लोगों में से थी जिन्होंने उस हादसे को अपनी आंखों से देखा। सच कहूं तो जिन्दगी में ही पहली बार कोई हादसा एकदम सामने यूं घटते देखा। कल किसी काम से मैं शाम को मां के यहां जा रही थी और उन्हीं के घर से थोड़ी दूरी पर मेरा अपना घर बन रहा है। मैं और नरेन्द्र प्लाट से निकले ही थी कि मैंने देखा आसमान एकदम पीला हो रहा है. मैंने नरेन्द्र से कहा कहीं पीली आंधी तो नहीं आ रही। तभी हमारी आंखों के ठीक सामने जोर का धमाका जैसे कोई बम फट गया है और आग की लपटें। चारों तरफ लाइट चली गई और गहरा अंधेरा। हम दोनों एकदम सन्न। हमने गाड़ी को ब्रेक लगाई। मैंने कहा नरेन्द्र मुझे लग रहा है कहीं कोई बम धमाका तो नहीं हुआ।
हम कुछ समझ नहीं पा रहे थे तभी कुछ लोग अपने घरों से निकले और बोले कि लगता है ट्रांसफारमर जल गया है। सामने आग की ऊंची ऊंची लपटें। हम तो यह तक नहीं समझ पा रहे थे, ये क्या हुआ और कैसे हुआ, हम इस आग से कितनी दूरी पर हैं। तभी हम लोगों ने उस तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। डेढ किलोमीटर आगे कुछ लोग अपनी गाड़ियां रोक कर खड़े थे। उन्होंने बताया कि सीतापुरा इंडस्ट्रीयल एरिया के पास इंडियन आ‍यल के आ‍यल डिपो में आग लग गई है। आग धमाके के साथ लगी थी इसलिए वो बम विस्फोट जैसा था। कुछ ही देर में टोंक रोड को बंद कर दिया गया। हम लग रहा था कि आग बस एकाध गली आगे ही लगी है वो हमसे तकरीबन पांच किलोमीटर दूर थी। सोचिए कितना बड़ा धमाका और आग थी जो पांच किलोमीटर से यूं लग रही थी कि बस यही तो है।
हम लोग घर पहुंचे तो टीवी पर भी लगातार यही खबर फ्लैश हो रही थी। आफिस में तो मैंने एक ही मिनट में सूचना दे दी थी , मौके पर फोटोग्राफर्स और रिपोर्ट्स पहुंच ही चुके थे। लगातार सबके टच में थी क्या हो रहा है कितनी कैजुअलटीज हैं।
घर पर भी सबकी सांस सूखी हुई थी। आग आठ किलोमीटर के दायरे में फैली थी औऱ हम आग से केवल पांच किलोमीटर के दूरी पर थे। हालांकि हवा का रूख विपरीत दिशा में होने की वजह से हमारी तरफ कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन दूसरी तरफ कुछेक फैक्ट्रियां और शोरूम जलकर खाक हो गए। आज सुबह तक मरने वालों की संख्या पांच थी लेकिन आशंका जताई जा रही है कि २०० से ज्यादा लोग जख्मी हुए हैं उनमें से कुछ बहुत सीरियसली जले हैं, इससे कैजुअलटी का आंकड़ा बढ़ सकता है।
पिछले साल बम धमाके और इस साल आग । वो भी ऐसी जो लगभग २० घंटे बीत जाने पर भी बुझने का नाम नहीं ले रही । आखिर मेरे शहर को किसकी नजर लग गई है। कभी सबसे ज्यादा शांतिप्रिय कहलाने वाला शहर और इस तरह की घटनाओं से दूर रहने वाला शहर आज हर साल कोई न कोई बड़ी आपदा झेल रहा है। आखिर क्यों?

Monday, October 26, 2009

पिंक प्रिंसेस इन हर पिंक वर्ल्ड

...पर इसके लिए बाजार जिम्मेदार है



मेरी छह साल की भतीजी आरूषि। उसे दुनिया में हर चीज पिंक चाहिए। पिंक ड्रेस, पिंक हेयर बैंड पिंक शूज एंड आन एंड आन। वो जब तीन साल की थी तब भी वो जानती थी कि उसे अपनी स्कर्ट के साथ आज पिंक टाप पहनना है और कल मजेंटा फ्राक। आय एम शाक्ड कि इतनी छोटी का रंगो के प्रति ऐसा गजब क्रेज। अभी दीपावली पर वो जयपुर आई तो मैंने मजाक में उसे छेड़ दिया कि उसके कमरे की दीवारों का रंग क्या होगा,
जवाब पिंक,


हम छत तो बनाएंगे नहीं फिर स्काय तो ब्लू होगा
जवाब नहीं मेरे घर का स्काय भी पिंक होगा,
और उनके स्टार
वो भी पिंक
आपके दांत
पिंक
उसे हर चीज पिंक चाहिए पर क्यों जवाब सुनिए क्योंकि पिंक गर्ल्स का कलर होता है न बुआ , आपको ये भी नहीं पता। ये मैं भी जानती हू पिंक गर्ल्स का कलर होता है, जैसा कि सारा बाजार सारा विज्ञापन जगत हमें बताता है। हो सकता है ये मनोचिकित्सक भी बताते हों कि लड़कियों को गुलाबी और लड़कों को नीले रंग लुभाते हैं लेकिन ये बात हमारे दिमाग में इतने गहरे तक कैसे बैठा दी गई है कि हमारा सब कुछ गुलाबी ही होता है।
जब मैं छोटी थी मुझे और मेरी सहेलियों को भी शायद पिंक पसंद रहा होगा , लेकिन हमें बाजार ने यह नहीं सिखाया था कि आपको सभी कुछ गुलाबी ही होना चाहिए। वहीं उसे बार्बी के घर से लेकर हर खिलौने और हर किताब में यही बताया जाता है कि सुंदर और प्यारी लड़कियों का रंग पिंक होता है तभी वो सबकी प्यारी बनी रह सकती है। और हर कोई उन्हें पैम्पर करेगा। कल तक यह कोई नहीं जानता था कि लड़कियों का रंग पिंक और लड़कों का रंग ब्लू होता है लेकिन बाजार ने इसे समझा और इतना जबरदस्त पक़ड़ा कि अब हर कोई तय करता है कि उसके बेटे के कमरे की दिवारों का रंग और बेटी के कमरों की दीवारों का रंग फ्लां होगा।
आखिर उस छोटी बच्ची के दिमाग में कहीं न कहीं हमने ही यह बात डाली होगी कि गुलाबी रंग उसे बाकी बच्चों में सर्वश्रेष्ठ बना देगा। हमें भी बाजार ने यह सिखाया होगा। लेकिन हम इसकी जब जरूरत होगी तभी इस्तेमाल करते हैं। पर वो बच्ची जो छह साल में इस रंग से इतना जबरदस्त बंध चुकी है वो अब ताउम्र इसकी मरीचिका से बाहर नहीं आ पाएगी। ये केवल एक रंग की ही बात नहीं है, ये बात आपके हमारे लाइफस्टाइल की है जो अब बाजार तय करता है,बाजार जो सीधा बगैर हमें माध्यम बनाए वहां तक पहुंच रहा है। कार्टून्स के जरिए, टीवी सीरियल्स, एड। कहां कहां से वो आपके बच्चे को बताता है कि इस ब्रांड का बर्गर खाओ, इस ब्रांड का कपड़ा पहनो, फ्लां चाकलेट और फ्ला नूडल खाओ। हम कहां तक और कैसे इसे रोकेंगे और ताउम्र के लिए बच्चों को कैसे इन चीजों से बचा पाएंगे।

Wednesday, October 14, 2009

मन नाद दे



नवनीत गुर्जर



स्टेट एडिटर दैनिक भास्कर राजस्थान




म न भी ब्रह्र। नाद भी ब्रह्म। जो मन से नाद को मिलाए वही मन्ना डे। दरअसल, हवा की तरह संगीत का भी कोई सिरा नहीं होता। शिखर कहीं भी हो सकता है। शुरुआत में भी। आखिर में भी और बीच में भी। मन्ना डे को कुछ इस तरह समझना होगा..
संगीत में सुर दो तरह के होते हैं। विचलित और अविचलित। विचलित वे पांच सुर हैं, जो कोमल भी होते हैं और तीव्र भी। दो सुर- षड्ज और पंचम स्थायी होते हैं। अविचलित और अडिग। न कोमल। न तीव्र। मन्ना डे षड्ज और पंचम के मिश्रण हैं।
षड्ज उनकी आवाज में भारीपन लाता है और पंचम उसमें मुर्कियां पिरोता है। इसीलिए वे मंद्रसप्तक में भी मुर्कियों का प्रयोग करने में माहिर हैं। उनकी यही खासियत उन्हें बाकी गायकों से अलग बनाती है। ‘हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है’ में ‘की’ में इतना सुंदर कम्पन मन्ना डे ही दे सकते हैं। एक तरफ वे ‘झनक-झनक तोरी बाजे पायलिया’ की शास्त्रीयता को अक्षुण्ण रखते हैं और दूसरी तरफ ‘ए मेरी ज़ोहरा ज़बी..’ में भारी आवाज के बावजूद शोखी पैदा करते हैं।
यह ‘वक्त’ का तकाजा नहीं, मन्ना दा की गायकी का कमाल है कि यह गाना तब बलराज साहनी पर भी मौजूं था और आज 35 साल बाद का युवा और 90 साल का बुजुर्ग भी इसे अपनी जीवनसाथी के लिए बड़े चाव से गाता है। वे सुरों की खूबसूरती को पात्र के हालात में पिरोते हैं। उनकी आवाज का दर्द उसमें भावनाएं भरता है। यही वजह है कि ‘ऐ मेरे प्यारे वतन..’ को आज भी कोई भारतीय, खासकर बेटी का पिता बिना रोए नहीं गा सकता।
मन्ना डे के व्यक्तित्व और गायकी की महानता यही है कि इतनी खूबियों के बावजूद वे आज के गानों से दूर रहे। षड्ज और पंचम की तरह अटल भी और कर्णप्रिय भी। कह सकते हैं- आधुनिक गानों और उनकी आय की चाह में वे कभी ऋषभ, गंधार या मध्यम नहीं हुए।
षड्ज और पंचम की तरह चिर स्थाई ही बने रहे। फाल्के अवार्ड उन्हें पाकर धन्य हो गया। धन्य इसलिए कि 1959 में नेशनल अवार्ड पाने वाले मन्ना डे को 40 साल बाद फाल्के अवार्ड देना सम चूकने जैसा है। प्रतिक्रिया में संगीत का सामान्य जानकार भी यही कह रहा है।

Tuesday, October 13, 2009

शब्द

बहुत दिनों पहले देर रात एक विदेशी फिल्म के लिरिक्स सुने थे, फिर सो नहीं सकी। घंटों बाद जो याद रहा, उसे अपने लफ्जों से रफू करके कागज पर उतार दिया, जिन्हें अब ब्लाग पर पोस्ट कर रही हूं

शब्द, जिन्हें कहना था
शब्द जो जुबां पर आते-आते हमेशा ठहर गए
शबद, जिन्हें बेहतरीन किताबों, शब्दकोशों से चुना गया था
...शब्द, जो यादों में हमेशा तैरते थे
शब्द जिन्हें प्रेम के सबसे खुशनुमा पलों में
हर प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है
शबद, जिन्हें संभाले-संभाले एक अर्सा गुजर चुका है
शब्द, जिन्हें मैं हमेशा से कहना चाहती थी
पर मैं दुनिया की सबसे डरी हुई इंसान हूं
और तुम सबसे बेफिक्र
...और अब मैं बेहद अकेली
स्याह उदास रातें मुझे अब भी डराती हैं
मेरे चेहरे पर आ रही महीन रेखाएं मुझे बता जाती हैं
कि मैं कितनी अकेली हूं
खैर, अब मुझे इससे खास फर्क नहीं पड़ता हालांकि
शब्द,अब भी बसे हैं यादों में, जिन्हें कहना था
लेकिन कभी कहा नहीं जा सका
...क्योंकि उन्हें कभी कहना ही नहीं था

Sunday, October 11, 2009

शांति के साथ क्रूरता

कल्पेश याग्निक
नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर


विश्व शांति के लिए 1994 में जब प्रमुख लड़ाकू फिलीस्तीनी नेता यासेर अराफात को नोबेल मिला था तो मखौल उड़ा था कि ‘क्या इस बार पुरस्कार के लिए हत्यारा होना शर्त थी?’ अब जबकि बराक ओबामा को यह सम्मान दिया गया है तो पूछा जा रहा है : क्या इस बार सिर्फ ‘बातें’ काफी थीं? कि एक पखवाड़े में आप विश्व शांति पर कितनी बात कर सकते हैं- यह परखा जा रहा था?जानना जरूरी होगा कि ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में काम शुरू किया। नोबेल शांति पुरस्कार के नाम लेने की अंतिम तारीख 1 फरवरी 2009 थी। यानी 11 दिन के उनके कार्यकाल पर उन्हें विश्व में अमन स्थापित करने का सम्मान दे दिया गया! यही नहीं, निर्णायकों ने अपने वोट जून में दे दिए थे- यानी तब भी चार माह हुए थे ओबामा के उन प्रयासों को, जो किसी और को तो खैर दिखे तक नहीं, किन्तु नोबेल कमेटी को ‘असाधारण, अद्वितीय’ लगे। सम्मान की घोषणा वाले दिन तक भी वे नौ माह पुराने ही ‘शांति के क्रांतिकारी’ हैं।संभवत: काहिरा में उनके भाषण का यह कमाल था। इसमें उन्होंने ‘अस्सलाम् वाएलेकुम’ कहकर अरब जगत को चौंका दिया था। हालांकि इजराइल-फिलस्तीन में अमन-चैन बढ़ाने वाले उनके जिन कथित प्रयासों की प्रशंसा नोबेल कमेटी ने की है- वे वास्तव में कहीं नजर ही नहीं आ रहे। यरुशलम में आज भी वैसी ही हिंसा भड़की हुई है। जिस रूस के बारे में उनकी बातचीत को ‘महान’ बताया जा रहा है- उसने भी कोई कागज नहीं दिखाया है और न कोई हस्ताक्षर कहीं किए हैं। यूं भी सोवियत संघ से बिखरकर रूस रह जाने की टीस क्रेमलिन को खोखला कर चुकी है। कुछ कर भी दिया तो इससे विश्व को क्या मिलेगा।ओबामा को सर्वोच्च सम्मान देना नोबेल कमेटी की विवशता हो सकती है और किसी को इससे फर्क भी नहीं पड़ता। प्रश्न केवल यह है कि कभी अंतरराष्ट्रीय पुलिस तो कभी विश्व के न्यायाधीश का भेष बनाने/बदलने वाले अमेरिका के उस राष्ट्रपति को आप कैसे यह तमगा जड़ सकते हैं, जिसने न तो इराक से अपनी सेनाएं वापस ली हैं,न ही अफगानिस्तान से। हमारे देश के परमाणु परीक्षण पर क्रंदन कर चुके अमेरिका के स्वयं के हथियारों में ओबामा ने क्या कमी की है? आज तो विश्व यह जानना चाहता है। यदि प्रमुख सैन्य जर्नल्स और किताबों पर निगाहें डालें तो पता चलता है कि ओबामा के नेतृत्व में वॉशिंगटन के पास आज 5500 से अधिक वॉरहेड्स हैं। यानी शक्तिशाली संहारक- परमाणु हथियारों और बमों- का सक्रिय जखीरा। और तिस पर वे बने हुए हैं हथियारों को समाप्त करने के अभियान के सिरमौर। बल्कि अब तो इस सम्मान में उन्हें ‘हथियारों की समाप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ आव्हान करने वाला’ कहा गया है। आव्हान यानी वही-बातें। सब कुछ कर लेने, सब कुछ पा लेने के बाद होता ही क्या है-बातें।विश्व में परमाणु हथियार बनाने वाला पहला देश अमेरिका था। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा-नागासाकी को तबाह कर वह एकमात्र ऐसा देश भी बन गया-जिसने इन हथियारों का वास्तविक उपयोग निर्दोषों का रक्तपात कर किया। आज विश्व के सात परमाणु देशों-अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, हिंदुस्तान और पाकिस्तान में कुल मिलाकर जितने एटमी बम होंगे(कोई 22-23 हजार), उनसे तीन गुना अधिक अमेरिका के पास रहे हैं। आज भी उसने हथियार जरूर कम कर दिए हैं, लेकिन क्षमता सर्वाधिक है।हमसे परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर दबावपूर्वक चाहते हैं-जबकि हमारी अघोषित, अनुमानित क्षमता बमुश्किल 30-35 वॉरहेड्स होगी। हमसे तो पाकिस्तान ने गुपचुप ज्यादा हथियार बना रखे हैं-जिसे लगातार अरबों डॉलर की मदद इन्हीं ओबामा के हस्ताक्षरों से दी जा रही है। उस पैसे को हमारे विरुद्ध चोरी के हथियारों पर खर्च किया जा रहा है- लेकिन सब कुछ सुन-समझ चुकने पर भी ओबामा क्या करते हैं-बातें। बेहतर तो होता कि उम्र, अनुभव और अभ्यास तीनों मानदंडों पर ‘अभी कम होने’ की विनम्रता दिखाते हुए ओबामा स्वयं इसे लेने से इनकार कर देते। किन्तु उनकी विनम्रता का तकाजा कुछ और रहा होगा। चाहे हमें वह क्रूर लगे।

Monday, July 27, 2009

गुर्जर आंदोलन it haunts me

मेरी बस एक झटके से सिकंदरा तिराहे पर रूकती है। लोगों कीआवाजाही वैसे ही है जैसे बाकी कस्बों और शहरों में है। फर्क है तो इतना इस तिराहे पर एक बोर्ड है जहां लिखा है - इस स्थान पर कई वीर गुर्जरों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। हमारी बस का कंडक्टर किसी परफेक्ट गाइड की तरह बताता है,यहीं पर 17 गुजरों का मारा गया था या वे शहीद हुए थे, वो खुद भी श्योर नहीं है।मैं आगरा से जयपुर लौट रही थी, दक्षिण भारत से वापसी में दिल्ली की बजाय मैं आगरा हो कर लौट रही थी। दिल्ली की बजाय आगरा ही उतर गई , तीन घंटे भी बचेंगे औऱ एक नया रूट भी देख लूंगी।मेरे सहयात्री भी चर्चा कर रहे हैं , हां इसी तिराहे पर पुलिस ने गोलियां चलाईं थी, कुछ कह रहे हैं कि आखिर उन्होंने भी तो सड़कें बंद कर थीं पुलिस भी क्या करती। एक बताता है मैं पिछले आंदोलन के समय दिल्ली फंस गया था, 15 दिन बाद घर लौट पाया । बस में चर्चाओं का दौर गर्म है, अजी साहब सब सरकार की मिलीभगत है, वरना यूं कोई महीनों सड़कों और पटरियों पर कब्जा कर नहीं बैठ सकता। तभी एक बूढ़ी महिला उस छोटे से तिराहे पर माथा टेकती है, पहनावे से वो गुर्जर ही लग रही है। हां, और कौन यहां माथा टेकेगा। मैं सोच रही हूं कहीं इसने भी तो अपना बेटा नहीं खोया उसी आंदोलन में। मैं अपनी यादाश्शत पर जोर दे रही हूं, इसकी फोटो कहीं मैंने उन मांओ के साथ तो नहीं लगाई थी जो अपने पुत्र उस आंदोलन की भेंट चढ़ा चुकी थी। आय एम फीलिंग नोस्टैलिजक। आखिर मुझे कोई गुर्जर नेता यहां माथा टेकता क्यों नहीं दिख रहा।ये बुढ़िया ही क्यों , मैं फिर उसकी शक्ल पहचानने की कोशिश कर रही हूं।ये उस 17 साल के लड़के की मां तो नहीं , जिसकी अभी मूंछे भी ठीक से नहीं उगी थी पर वो आरक्षण लेने चहां चला आया, लेकिन फिर कभी लौट नहीं सका।अगर ये उसकी मां न भी हो तो उसकी मां भी तो ऐसी ही दिखती होगी। ऐसा ही घाघरा ऐसी लुगड़ी। ऐसी ही उदासी।या उस किशोर की 16 साल की पत्नी , जिसका अभी गौना भी नहीं हुआ था।, पेज बनाते समय मैंने फोटोग्राफर को फोन कर कहा था, अरे यार विजुअल तो ढंग का भिजवाओ। ये तो किसी काम का नहीं इसे देखकर संवेदनाएं नहीं जागतीं। और फिर फोटो आई,माथे तक घूंघट खींचे, सूजी आंखों वाली वह किशोरी । साफ दिखता था कि पिछले कुछ दिनों में वो इतना रो चुकी है कि अब आंसू औऱ हिम्मत दोनों ही नहीं बचे। पर हर रोज इन लाशों की गिनती और बेटों और पतियों की लाशों पर विलाप करती इन औरतों के फोटो लगाते-लगाते हमारी संवेदनाएं कहां गई ,तभी तो मैं आपरेटर को यह कह सकी , फोटो लगा और पेज छोड़। वरना अखबार लेट हो जाएगा।
कल से फिर गुर्जरों का जमावड़ा शुरू हो चुका है, क्या हम तीसरे गुर्जर आंदोलन देखने के लिए तैयार हैं।

Tuesday, July 14, 2009

नो सीएम आफ्टर एट पीएम



राजस्थान विधानसभा में ऐसा भी होता है


?गर मैं तुम्हारी पत्नी के बारे में कहूं

?ो सीएम आफ्टर एट पीएम
?े जुमला पूरे राजस्थान ने पिछले पांच साल तक बहुत बार सुना,अलग-अलग लोगों के मुंह से सुना और हर बार इसके अर्थ अलग ढंग से लगते रहे। कभी नाराजगी भरे लहजे में कभी तंज तो कभी मजाक। पर ये मुद्दा विधानसभा के गलियारों में गूंजेगा ये तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पिछली सरकार द्वारा शराब की खुलेआम बिक्री के खिलाफ तो थे ही उन्होंने सत्ता में आते ही न सिर्फ दुकानों का समय कम करवा दिया , बल्कि उसे फिर से दबी छुपी स्थिति में पहुंचा दिया। (बस गुजरात की तरह शराब बंदी लागू नहीं की)
तो जनाब अति उत्साह में बजट भाषण में हमारे सीएम साहब कह गए, 8 बजे बाद शराब नहीं पीएं या 8 से पहले पी लें या फिर घर पर धीरे-धीरे पी लें। अब इस बात को लेकर कल विधानसभा में भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत ने चुटकी ले ली। लेकिन कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी कह दिया शराब पर डिबेट कराना चाहते हो तो करा लेते हैं। आप जो बात हमारे मुख्यमंत्री के लिए कह रहे हैं। तो अपने नेता की तरफ भी देख लें। फिर काफी कुछ ..... और रघु शर्मा बोल उठे आफ्टर एट पीएम नो सीएम। भाजपा के राज में आठ बजे बाद जनता सीएम को ढूंढती रहती थी।
बड़ी देर से शांत बैठी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी अब बोल उठीं। हाउस में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करें। लेकिन तूतू-मैं मैं बढ़ती गई और राजे ने कहा कि आपको इस असभ्य भाषा के लिए अपोलोजी करनी चाहिए। अगर मैं यह कह दूं कि आपकी पत्नी रोज शाम को शराब पीकर नाचती है तो...यह कोई बात है कि आफ्टचर एट पीएम नो सीएम