
यूं तो पढ़ने को बहुत ज्यादा टाइम इन दिनों नहीं मिलता , फिर भी चेतन भगत की दो किताबें थीं जो मैं काफी समय से पढ़ना चाह रही थी तो इस बार दिल्ली जाना हुआ तो मैंने सोचा क्यों न रास्ते में दोनों किताबें पढ ली जाएं। तो पहले छूटी हुई किताब वन नाइट एट काल सेंटर का नंबर लगा वो इसलिए भी की क्योंकि लेखक ने भी टू स्टेट्स से पहले यह किताब लिखी है।(टू स्टेट्स अभी रिसंटली पब्लिश हुई है) वन नाइट एट काल सेंटर कहानी है छह लोगों की जो एक काल सेंटर के एक ही सेक्शन में साथ काम करते हैं, और सभी की जिन्दगी सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। ऐसे में वे एक ड्राइव पर जाते हैं औऱ उनकी गाड़ी एक बन रही बिल्डिंग के गड्ढे में फंस जाती है , सबको लगता है मौत आने ही वाली है पर तभी एक फोन बजता है जो भगवान का है ( ओ माय गाड मैं कम से कम चेतन भगत से यह एक्सपेक्ट नहीं कर रही थी) मैं नावेल पढ़ रही थी औऱ मुझे लगा रहा था कि मैं किसी बालीवुड फिल्म की स्टोरी सुन रही हूं। खैर जैसा भी हो भगवान उन सब को कुछ राय देते हैं और उनकी लाइफ वापस ट्रेक पर आ जाती है। भगवान में यकीन करने वाले लोगों के लिए यह स्टोरी गजब है, पर मुझे बिलकुल मजा नहीं आया। इसकी बजाय मुझे टू स्टेट्स थोड़ी ठीक लग रही है, जिसका पढ़ना फिलहाल जारी है. पर इन दिनों समयाभव के कारण उसके अंतिम कुछ पन्ने बचे हैं जिस दिन पढ़ती हूं उस दिन उसके बारे में लिखूंगी।
..और हां पता नहीं क्यों चेतन भगत की हर किताब में नायक खुद को लूजर लूजर बताता अंत में सब कुछ पा जाता है मन पसंद लड़की, मां बाप का साथ औऱ ढेर सा पैसा गजब है न। तभी तो बालीवुड डायरेक्टर्स उसकी कहानियां फिल्में बनाने के लिए रेजिज्ट नहीं कर पाते। हालांकि वन नाइट एट काल सेंटर पर बनी मूवी हैलो या ऐसा ही कुछ नाम था, डिजाजस्टर थी. बाप रे आप अमृता अरोड़ा और सुहेल टाइप लोगों को कैसे झेल सकते हैं। शायद अतुल अग्निहोत्री ने बनाई थी तो ऐसी ही होनी थी।
चेतन की स्टोरी पर बेस्ड एक और मूवी आने वाली है थ्री इडियट्स जो उनकी पहली किताब फाइव पाइंट्स समवन पर लिखी है जो आज भी मुझे उनकी बेहतरीन किताब लगती है। दिल से और पूरी इमानदारी से लिखी गई किताब है जहां लगता है कि नायक वाकई लूजर है :-)



और लड़कों को नीले रंग लुभाते हैं लेकिन ये बात हमारे दिमाग में इतने गहरे तक कैसे बैठा दी गई है कि हमारा सब कुछ गुलाबी ही होता है।
मुर्कियां पिरोता है। इसीलिए वे मंद्रसप्तक में भी मुर्कियों का प्रयोग करने में माहिर हैं। उनकी यही खासियत उन्हें बाकी गायकों से अलग बनाती है। ‘हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है’ में ‘की’ में इतना सुंदर कम्पन मन्ना डे ही दे सकते हैं। एक तरफ वे ‘झनक-झनक तोरी बाजे पायलिया’ की शास्त्रीयता को अक्षुण्ण रखते हैं और दूसरी तरफ ‘ए मेरी ज़ोहरा ज़बी..’ में भारी आवाज के बावजूद शोखी पैदा करते हैं।

