





कुछ बातें हैं जिन्हें कहना है



हवामहल, नाम ही से लगता है वो महल जहां चारों तरफ हवा ही हवा हो। तभी तो जयपुर राजघराने ने सदा परदे में रहने वाली अपनी रानियों के लिए शहर के बीचोंबीच ये भव्य महल बनवाया था, जहां से गर्मी से तपने वाले जयपुर में भी सदा हवा का अहसास होता रहे।
साथ ही यह रानियां बाजार, त्योहार और शाही सवारियों को इन झरोखों से देख सकें जबकि बाहर खड़ी जनता को ये भी न पता चले कि रानियां भी इन उत्सवों का आनंद ले रही हैं।
हवामहल का निर्माण 1799 ई0 में सवाई प्रताप सिंह द्वारा करवाया गया था। प्रताप सिंह भगवान कृष्ण के उपासक थे और भगवान कृष्ण के मुकुट से प्रेरित होकर उन्होंने लालचंद से हवा महल का डिजायन करवाया था। हवामहल में 953 छोटे बड़े झरोखे हैं।
(दैनिक भास्कर डॉट कॉम से साभार)

संसद गर्माएगी। करेगी बहस। लोकपाल पर। सरकारी नहीं। हमारे भी। जन लोकपाल। जनप्रतिनिधि बोलेंगे। प्रशंसा करेंगे - अन्ना की। जनता की। अभियान की। बधाई देंगे - धैर्य पर। शांति पर। अहिंसा पर। फिर बरसेंगे - भ्रष्टाचार पर। खामियों पर। सरकार पर। खुद पर। खुद पर? जी, हां। ऐसा होगा। उदाहरण देंगे। नाकामी के। लोकपाल नहीं। 42 बरस। 9 बार पेश। 23 बहस। यही संसद। वही सांसद। लोकपाल मांगा। बिल बनाए। पेश किए। विफल किए। फिर लाए। फिर खारिज। वही दल। वही नेता। नए तथ्य। बदले तर्क। गलत नहीं। थोपे नहीं। बाकायदा जीते। हमने जिताए। चौंकिएगा नहीं। सिर्फ सोचिएगा। सौ बार। कि आप चुन किसे रहे हैं?
कमी क्या? लाखों लोग। अनूठी एकता। सभी दृढ़। नेतृत्व पवित्र। अनुयायी प्रतिबद्ध। अहिंसक जनसैलाब। राह पता। दिशा तय। लक्ष्य साफ। तो क्या? कमजोर कहां? कहीं नहीं। कमजोरी नहीं। व्यवस्था अलग। सिस्टम कहिए। संसद हो। विधानसभाएं हों। नगर निगम। पंचायतें हों। नाम कोई। वही चलाएंगे। हम नहीं। हम चुनेंगे। वे चलाएंगे। सिस्टम को। सदनों को। सरकार को। हमें भी। हमें ही। स्पष्ट है। कमी नहीं। लाखों हों। करोड़ों हों। फर्क नहीं। वे चलाएंगे। वे बनाएंगे। नियम, कायदे। लोकपाल लाएंगे। जनलोकपाल सुनेंगे। भ्रष्टाचार हटाएंगे। भ्रष्टाचार बढ़ाएंगे। गलत नहीं। व्यवस्था है। हमने बनाई। या बनवाई। चौंकिएगा नहीं। सिर्फ सोचिएगा। सौ बार। कि आप चुन किसे रहे हैं?
तो जनक्रांति? क्या महत्वहीन? करोड़ों लोग। सिर्फ भीड़? और राष्ट्रहित। सिर्फ भाषण? सामाजिक-आर्थिक बदलाव। सिर्फ सपना? ऐसा नहीं। जनक्रांतियां सर्वश्रेष्ठ। लोग सर्वोच्च। तो क्या? कमी कहां? कहीं नहीं। स्वतंत्रता संग्राम। महानतम जनक्रांति। विश्व में। सबसे बड़ी। सबसे लंबी। क्योंकि तय। लक्ष्य तय। अंत तय। सबको पता। सेनानियों को। हिंदुस्तानियों को। फिरंगियों को। दुनियाभर को। अंग्रेज हटेंगे। नहीं चौंकी। दुनिया मानी। क्योंकि देश ने, आजादी के मतवालों ने सौ बार सोच लिया था। अंग्रेजों को भगाने के लिए गांधी को चुना था।
सिद्ध हुआ। अंत पता। तो महान्। पता नहीं। तो व्यर्थ। उदाहरण हैं। अरब देश। उत्तरी अफ्रीका। एकदम ताजा। ट्यूनीशिया टूटा। मिस्त्र मटियामेट। लीबिया लावारिस। देखिए क्यों? तैयारी नहीं। तख्त पलटे। शासक नेस्तनाबूत। यूं सफल। लेकिन विफल। विकल्प नहीं। अंत नहीं। बची अराजकता। साफ है। सोचा नहीं। कि यह लड़ाई लड़ने के लिए चुन किसे रहे हैं। फिर लौटें। लोकपाल पर। आज पर। नए प्रश्न। इतनी देरी? सरकार निडर। ऐसा क्यों? दो कारण।
विपक्ष साथ। पक्ष अटूट। सरकार मजबूत। चुनाव दूर। काफी दूर। सरकार मजबूत। तो जनहित? और राष्ट्रहित? तय कीजिए। अगली बार। चूंकि हम 121 करोड़ नागरिक इकट्ठे भी हो जाएं तो व्यवस्था हाथ में नहीं ले सकते। किसी को सौंपनी ही होगी। जैसे जनक्रांति के लिए अन्ना श्रेष्ठ चयन हैं। वैसे ही जनप्रतिनिधि के लिए सौ बार सोचिएगा कि आप चुन किसे रहे हैं? भास्कर जगाएगा। हमेशा जैसे।
(लेखक दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर हैं)।